अभी तक पेरिस ओलंपिक में पांच खिलाड़ी अपने कैटेगरी वजन से ज्यादा वजन होने के लिए निष्कासित हो चुके।
1. विनेश फोगाट (भारत) : 50 KG फ्री स्टाइल कुश्ती
2. एमानुएला लिउजी (इटली) : 50 KG फ्री स्टाइल कुश्ती
3. मेसाउंड ड्रिस (अल्जीरिया) : जूडो
4. बेटीरब्रेक साकुलोव (स्लोवाकिया) : 65KG फ्री स्टाइल कुश्ती
5. दानिला सेमेनोव (रूस): 92KG लाइट हेवी वेट कुश्ती (Note: Russian athletes are "Individual Neutral Athletes." As such, there are only 15 Russian athletes competing at the Summer Games in France this year.)
Economica
The aim is to discuss and educate friends about ongoing developments in Indian and Global Economy.
24/05/2023
ज़िम्मेदार लोगों से विनम्र निवेदन।
17/09/2021
20, 21 and 22 September, 2021 at 11.00 AM. Join the discussion on taxes and tax reforms in India. For joining use my referral code arunesh_singh.
UPSC CSE - GS - Taxes and tax Reforms in India part 1 Concepts Explained on Unacademy Understand the concept of Taxes and tax Reforms in India part 1 with UPSC CSE - GS course curated by Arunesh Singh on Unacademy. The Indian Economy course is delivered in Hindi.
20, 21 and 22 September, 2021 at 11.00 AM. Join the discussion on taxes and tax reforms in India. For joining use my referral code arunesh_singh.
https://unacademy.com/class/taxes-and-tax-reforms-in-india-part-1/KVFR0J4Q
15/09/2020
https://unacademy.com/class/decoding-indian-economy-module-for-upsc-cse/JFUG4HE9
Decoding 'Indian Economy' module for UPSC-CSE | Unacademy In this session, Arunesh Singh will discuss important concepts of Decoding 'Indian Economy and there will be an attempt to identify the areas which are important for UPSC-CSE prelims and mains exam with the help of given syllabus and previous years' question papers.
आर्थिक सुधार का मार्ग लंबा, कठिन व कष्टप्रद
(शंकर आचार्य )
(साभार बिजनस स्टैन्डर्ड )
चार महीने पहले मैंने एक आलेख में कोविड-19 महामारी के कारण सरकार द्वारा अचानक लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन को देखते हुए अर्थव्यवस्था को पहुंचने वाली अप्रत्याशित क्षति को लेकर दो तरह के परिदृश्य सामने रखे थे। शायद वह पहला मौका था जब आर्थिक गतिविधियों में तिमाही दर तिमाही गिरावट को लेकर निराशाजनक पूर्वानुमान पेश किए गए थे। एक अनुमान यह था कि वर्ष 2020-21 में वास्तविक जीडीपी 11 फीसदी गिरेगी जबकि पहली तिमाही में 25 फीसदी गिरावट आएगी। जबकि दूसरे परिदृश्य में पूरे वर्ष के दौरान 14 प्रतिशत और पहली तिमाही में 33 प्रतिशत गिरावट का अनुमान था। ये अनुमान ऐसे वक्त पर जताए गए थे जब विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, वित्त मंत्रालय समेत लगभग सभी निवेश बैंक और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां 0 से 2 फीसदी सकारात्मक वृद्धि दर का कयास लगा रही थीं।
अब चंद रोज पहले राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने पहली तिमाही में जीडीपी में 24 फीसदी गिरावट का अनुमान जताया जो मेरे पहले परिदृश्य के समान था। चूंकि ऐसे तिमाही अनुमान प्राय: संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के साथ ही गैर कृषि क्षेत्र की घटनाओं को दर्ज कर पाने में नाकाम रहते हैं इसलिए बाद में गिरावट के इस अनुमान में संशोधन होने की संभावना है। ऐसा इसलिए क्योंकि लॉकडाउन ने इन क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित किया है। ऐसे में जीडीपी में पहली तिमाही में आई गिरावट बढ़कर करीब 30 फीसदी तक जा सकती है। 24 फीसदी की गिरावट उत्पादन और आय में भारी गिरावट का संकेत देती है। यह जी-20 देशों में सर्वाधिक है। जैसा कि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) ने इशारा किया यह शायद इसलिए हुआ क्योंकि भारत में शुरुआती दो महीनों का लॉकडाउन दुनिया का सबसे कड़ा लॉकडाउन था। इससे मिलने वाले आनुपातिक स्वास्थ्य संबंधी लाभ के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस दिशा में विश्वसनीय जवाब बाद में सामने आएंगे।
स्वाभाविक सी बात है कि अब पूरा ध्यान इस आर्थिक झटके के दुष्प्रभावों से निपटने पर है। सीईए का कहना है कि अंग्रेजी के 'वी' आकार का सुधार देखने को मिलेगा यानी तेज गिरावट के बाद तेज सुधार। मुझे डर है कि ऐसा नहीं होगा। मैंने मई के दोनों परिदृश्यों में कहा था कि दूसरी तिमाही में आंशिक सुधार होगा जबकि बाकी बची दो तिमाहियों में स्थिरता रहेगी। साल दर साल आधार पर दूसरी तिमाही में वृद्धि दर 10 से 12 फीसदी ऋणात्मक रहेगी जबकि तीसरी और चौथी तिमाही में यह क्रमश 5 से 7 और 4 से 5 फीसदी ऋणात्मक रहेगी। इन तमाम बातों को देखते हुए कह सकता हूं कि मेरे अनुमान काफी हद तक सच के करीब रहे हैं। बल्कि कुछ बेहतर ही नजर आ रहे हैं। यानी 2021-22 में पूरे वर्ष की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 2019-20 के स्तर से कम रहेगी। यह 'वी' आकार का सुधार तो नहीं है। आर्थिक सुधार के धीमा होने के अनुमान के पीछे कई वजह हैं। पहली बात, हमें समझना होगा कि केंद्र सरकार के लॉकडाउन के फैसले से आपूर्ति क्षेत्र को तगड़ा झटका लगा। जून में चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन समाप्त होने के बाद राज्य सरकारों की ओर से आंशिक लॉकडाउन लगाए जाते रहेे। इससे आपूर्ति शृंखला बुरी तरह बाधित हुई। यानी वर्ष के बचे हुए समय में आर्थिक उत्पादन आपूर्ति क्षेत्र की बाधाओं से अधिक निर्धारित होगा, बजाय कि मांग के। ऐसे में राजकोषीय प्रोत्साहन की मांगें गलत हैं। गरीबों और प्रभावितों को राहत देना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी और है। सरकार ने कमजोर आपूर्ति व्यवस्था और खराब राजकोषीय हालात के बीच अपनी सीमा में काफी काम किया।
दूसरी बात, शुरुआती दौर में लगे कड़े लॉकडाउन ने केंद्र और राज्य सरकारों की पहले से खस्ता हालत को और बुरा बना दिया क्योंकि राजस्व का कोई जरिया नहीं बचा। यदि कोविड महामारी को हटा भी दें तो भी 2020-21 में केंद्र और राज्य सरकार का समेकित घाटा जीडीपी के 8 फीसदी के आसपास ठहरता। कोविड लॉकडाउन के बाद यह जीडीपी के 13 से 15 फीसदी के स्तर तक जा सकता है। यानी साल के अंत में सरकार का डेट/जीडीपी अनुपात 85-90 फीसदी के खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। भारी-भरकम ब्याज का बोझ और उधारी की आवश्यकताएं भविष्य की आर्थिक वृद्धि पर बोझ डालेगी और मुद्रास्फीति में इजाफा करेगी।
तीसरा फिलहाल जोखिम से बचने की प्रवृत्ति आर्थिक स्थितियों में सुधार की राह में सबसे बड़ी बाधा है। जोखिम से बचाव के उपाय संस्थानों की लागत बढ़ा रहे हैं और आपूर्ति पर असर हुआ है। कामगारों का जोखिम से बचना भी समस्या है। इतना ही नहीं आपूर्ति काफी प्रभावित है क्योंकि बड़ी तादाद में छोटे और मझोले उपक्रम अब काम नहीं कर पा रहे हैं। उपभोक्ता, खासकर वृद्धि और अमीर उपभोक्ता निकट संपर्क वाले लेनदेन से बच रहे हैं। एमेजॉन और फ्लिपकार्ट नाई की दुकान, हवाई या रेल यात्रा, रेस्तरां, होटल, पर्यटन और सेवा क्षेत्र के अन्य उद्योगों के विकल्प नहीं हो सकते।
चौथ, वित्तीय बिचौलिया क्षेत्र नए सिरे से दबाव में है क्योंकि ऋण और बकाये की स्थिति बेहद खराब नजर आ रही है। आरबीआई ने नियामकीय धैर्य दर्शाया है और न्यायालयों ने कर्जदारों के पक्ष में निर्णय दिए हैं। इससे वाणिज्यिक बैंकों और एनबीएफसी के लिए मुसीबत बढ़ी है। जमाकर्ताओं की बचत की दृष्टि से भी यह अच्छा संकेत नहीं है। इससे नया ऋण बहुत अधिक प्रभावित होगा। बैंकों और एनबीएफसी को उबारने की और घटनाएं सामने आएंगी। परंतु बड़ा सवाल यह है कि इसके लिए संसाधन कहां से आएंगे?
पांचवां, विश्व अर्थव्यवस्था सुधार की दिशा में अग्रसर है और इसके साथ ही विश्व व्यापार में भी सुधार हो रहा है। ऐसे में बाह्य बाजारों से आशा की जा सकती है कि वे तेजी के वाहक बनेंगे। खासतौर पर तेजी से सुधर रहे पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के बाजारों से। परंतु ऐसे अवसरों का लाभ लेने के लिए हमें संरक्षणवादी रुख को छोडऩा होगा और क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी में शामिल होना पड़ेगा। इसकी कितनी संभावना नजर आती है?
इन तमाम वजहों से मुझे नहीं लगता कि मध्यम अवधि में यानी 2021-22 के पहले आर्थिक वृद्धि में कोई खास सुधार देखने को मिलेगा। जैसा कि मैंने जून में लिखा था, मध्यम अवधि में 3 से 5 फीसदी की वृद्धि दर भी दूर की कौड़ी नजर आती है। आर्थिक सामाजिक और सामरिक परिणाम काफी हद तक नकारात्मक रहेंगे। परंतु इस विषय पर हम फिर कभी बात करेंगे।
(लेखक इक्रियर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)
लोक निर्माण से जुड़ा इतिहास का सबक
(विनायक चटर्जी)
(साभार हिंदुस्तान )
आर्थिक नीति को लेकर भारत के सबसे शुरुआती प्रयोग 18वीं सदी के अंत समय में अंजाम दिए गए थे जिनमें रोजगार देने पर खास जोर था। वर्ष 1784 में भीषण अकाल के समय अवध के नवाब आसफुद्दौला ने अपनी अवाम को रोजगार देने के लिए एक लोक निर्माण कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा की थी। इस तरह लखनऊ के मशहूर बड़ा इमामबाड़ा मस्जिद परिसर के निर्माण की शुरुआत हुई और यह 1791 में बनकर पूरा हो गया। यह एक तरह से कीन्स के आगमन के दशकों पहले कीन्सवादी अर्थशास्त्र का सूत्रपात था।
वैचारिक कारणों से ब्रिटिश शासकों ने एक कदम पीछे खींचा। दरअसल उनके अहस्तक्षेप (लेसे-फेर) के रवैये की वजह से विक्टोरिया काल में आए भीषण अकालों के दौरान करोड़ों लोगों की मौत हो गई थी। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़ा इमामबाड़ा जैसी दूसरी परियोजनाएं भी चलाई गईं लेकिन 20वीं सदी में कीन्स के विकास मॉडल के प्रतिपादन के बाद ही सरकारों ने बड़े आर्थिक संकट के समय लोक निर्माण कार्यों को व्यवस्थागत रूप देकर रोजगार एवं आय को बढ़ाने के प्रयास किए। अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट का 1930 के दशक में चलाया गया न्यू डील कार्यक्रम महान आधुनिक दौर का पहला लोक निर्माण कार्यक्रम था जिसका मकसद आर्थिक मंदी के संकट में रोजगार देना था। रूजवेल्ट एक डेमोक्रेट थे। फिर भी लगभग उसी समय यूरोप में एकदम अलग राजनीतिक सोच वाले एक अन्य नेता इन्हीं वजहों से बड़े स्तर पर लोक निर्माण कार्यक्रम शुरू करने वाले थे। वह देश जर्मनी था और उस नेता का नाम एडॉल्फ हिटलर था। हिटलर ने जो परियोजना शुरू की थी वह आज की मशहूर हाई-स्पीड ऑटोबॉन सड़क प्रणाली थी।
अब हम 1970 के दशक में महाराष्ट्र की ओर चलते हैं। विश्व बैंक ने 2013 में लोक निर्माण कार्यक्रमों के बारे में एक अध्ययन में कहा था, 'वृहद स्तर पर लोक निर्माण कार्यक्रम शुरू करने की मौजूदा प्रवृत्ति की जड़ें काफी हद तक महाराष्ट्र के 1970 के अनुभवों में निहित हैं। उस समय महाराष्ट्र भीषण अकाल का सामना कर रहा था जिसकी वजह से उसकी करीब 70 फीसदी ग्रामीण आबादी गरीब हो चुकी थी।' वैसे समय में महाराष्ट्र में शुरू की गई ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ही बाद में भारत के साथ दुनिया भर में आने वाली ऐसी योजनाओं की अग्रदूत बनी । इसी रिपोर्ट में कहा गया, 'लोक निर्माण कार्यक्रम सामाजिक सुरक्षा एवं संरक्षा के एक जाल के तौर पर उभरे हैं। यह न केवल निम्न आय वाले देशों एवं कमजोर राज्यों बल्कि वैश्विक आर्थिक संकट की वजह से उच्च बेरोजगारी से जूझ रहे मध्यम-आय वाले देशों के लिए भी मददगार रहा है।'
ये सारे वाकये लोक निर्माण की चिरस्थायी प्रकृति को रेखांकित करते हैं। पहली बात, संकट के समय लोक निर्माण कार्यों का इस्तेमाल तमाम वैचारिक आयामों में आर्थिक नीति के साधन के तौर पर होता है। एक रिपब्लिकन राष्ट्रपति के होते हुए भी अमेरिका कोविड संकट के आर्थिक दुष्प्रभावों से निपटने के लिए 20 लाख करोड़ डॉलर की राजकोषीय राहत की घोषणा करने वाले शुरुआती देशों में से एक रहा। विकसित देशों में राजकोषीय समझदारी का सर्वाधिक पालन करने वाले जर्मनी ने भी हालात के आगे घुटने टेके हैं और कोविड महामारी से पैदा आर्थिक दुश्वारियों से निपटने के लिए राजकोषीय राहत की घोषणा की है। हाल ही में भारत सरकार ने भी 50,000 करोड़ रुपये वाली ग्रामीण लोक निर्माण योजना (गरीब कल्याण रोजगार अभियान) शुरू की है जिसका मकसद कोरोना काल में अपने गांव लौटने वाले प्रवासी मजदूरों को रोजगार के अवसर मुहैया कराना है।
लेकिन असली चुनौती यह है कि रोजगार प्रदान करने के साथ टिकाऊ परिसंपत्ति के निर्माण भी हों। हाल के दशकों में जन राहत कार्यक्रमों के तहत चलाए गए तमाम अभियानों में कोई टिकाऊ परिसंपत्ति नहीं बन पाई है। इस मायने में ये कार्यक्रम बड़ा इमामबाड़ा या न्यू डील या जर्मन ऑटोबॉन जैसे पुराने दौर के कार्यक्रमों से काफी अलग हैं जिनमें दीर्घकालिक महत्त्व की इमारतें एवं उपयोगी संसाधन बनाए गए।
परिसंपत्ति निर्माण को केंद्र में रखने वाले लोक निर्माण परियोजनाएं दो प्रकार में बांटी जा सकती हैं। पहली, ग्रामीण सड़कें, स्कूल, क्लिनिक, पंचायत कार्यालय, जल स्रोतों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार जैसी परियोजनाएं अपेक्षाकृत छोटे आकार की होती हैं। गरीब कल्याण रोजगार अभियान में यही नजरिया अपनाया गया है। हालांकि इनमें स्थानीय लोगों की कहीं अधिक भागीदारी की संकल्पना की गई है। स्थानीय समुदाय न केवल इन परियोजनाओं के निर्माण में अधिक बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं बल्कि इनके रखरखाव के काम में भी उनका जुड़ाव बना रहेगा। यह कहीं अधिक सरल परियोजनाओं की पहली कतार है जहां से गांव में स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन को असली बढ़ावा मिलेगा।
दूसरी तरह की परियोजनाएं बड़ी होती हैं और उनमें अधिक पूंजी की भी जरूरत होती है। मसलन, राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्ग, जिलों की बड़ी सड़कें, तटीय आर्थिक क्षेत्र, कम लागत वाली आवासीय परियोजनाएं, राज्यों में नई राजधानियों का निर्माण, बड़ी सिंचाई परियोजनाएं और हरेक घर तक 24 घंटे पानी की आपूर्ति। इन परियोजनाओं के निर्माण में सबसे कारगर निर्माण तरीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाना चाहिए और इस ढांचे के भीतर अधिकतम लोगों को रोजगार देने का लक्ष्य रखना चाहिए। मई मध्य में प्रकाशित अपने एक लेख में मैंने 30 लाख करोड़ रुपये के राष्ट्रीय नवीकरण कोष (एनआरएफ) के तहत क्रियान्वित हो सकने वाली परियोजनाओं का खाका पेश किया था।
कोविड महामारी की वजह से पैदा हुए इस संकट ने भारी आर्थिक उथलपुथल मचाई है। करोड़ों लोगों का काम-धंधा छिन गया है और उन्हें अपना भविष्य भी अनिश्चित दिख रहा है। ऐसे समय में बड़े स्तर पर रोजगार पैदा कर सकने वाली परियोजनाओं के बारे में नए सिरे से सोचने एवं अपनी प्राथमिकताएं फिर से तय करना अवश्यंभावी है। यह कार्य राष्ट्रीय एवं स्थानीय दोनों ही स्तरों पर किया जाना चाहिए ताकि इनसे ऐसी परिसंपत्तियों का सृजन हो जो कई पीढिय़ों तक बनी रहें।
इतिहास ने हमें यही सबक सिखाया है कि इस तरह के लोक निर्माण कार्यक्रम वक्त की जरूरत होने के साथ ही क्रियान्वयन के स्तर पर भी मुमकिन हैं।
(लेखक ढांचागत सलाहकार फर्म फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)
27/04/2020
Indian Economy Test Series CSE Prelims 2020 Discussion by Arunesh Singh|| Prashasnik Gurukul ...
अलग आर्थिक घेरा बनाकर ही निकलेगा रास्ता
(डॉ भरत झुनझुनवाला )
(साभार NBT)
कोरोना वायरस के लंबे समय तक टिके रहने में तीन प्रकार की अनिश्चितताएं हैं। पहली यह कि इसके प्रतिरोध के लिए वैक्सीन बन पाती है या नहीं। यदि वैक्सीन बन जाती है तो इसके प्रकोप पर नियंत्रण हो सकता है, या फिर यह दीर्घकाल तक जारी रहेगा। दूसरी अनिश्चितता यह कि यह वायरस गर्मी के मौसम में समाप्त होता है, या छुपा रहता है। यदि छुपा रह जाता है तो आने वाले जाड़े में यह फिर प्रकट हो जाएगा और सभी अर्थव्यवस्थाएं एक बार फिर दबाव में आएंगी। तीसरी अनिश्चितता यह कि आम आदमी इसके प्रति इम्यूनिटी यानी प्रतिरोधक शक्ति हासिल करता है या नहीं। यदि इम्यूनिटी विकसित हो जाती है तो कोरोना का प्रभाव सीमित हो जाएगा। यदि इम्यूनिटी विकसित नहीं हुई तो प्रकोप बार-बार उत्पन्न होगा।• कितनी देर में उबरेंगे
इन अनिश्चितताओं पर ही निर्भर करेगा कि कोरोना का आर्थिक प्रभाव अंग्रेजी के अक्षर U के समान होता है अथवा L के समान। U का अर्थ हुआ कि कुछ समय के लिए प्रभाव हुआ और शीघ्र ही अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई। L का अर्थ हुआ कि वैक्सीन विकसित नहीं हुई, वायरस जाड़े में पुनः प्रकट हुआ और आदमी में इम्यूनिटी विकसित नहीं हुई, जिससे प्रभाव लंबे समय तक खिंचता गया। इस अनिश्चितता से निर्धारित होगा कि कोरोना प्रभाव अल्पकालीन होगा या दीर्घकालीन। अल्पकालीन हो तो भी संकट गहरा है। कारण यह कि 21 दिन के लॉकडाउन में उद्योगों की आय शून्य हो गई है, जबकि उन्होंने बैंकों से जो ऋण ले रखा है उस पर ब्याज चढ़ता जा रहा है।
यदि बैंक इस ब्याज को माफ कर दें तो वह संकट बैंक के ऊपर आएगा क्योंकि बैंक ने आम आदमी से फिक्स्ड डिपॉजिट इत्यादि में रकम जमा ले रखी है, जिस पर ब्याज देना बैंक के लिए जरूरी होगा। यदि सरकार कानून लाकर इस पूरी 21 दिन की अवधि में सभी प्रकार के ब्याज को निरस्त कर दे तो भी संकट बनेगा क्योंकि जो आम आदमी फिक्स्ड डिपॉजिट की आय से ही अपना खर्चा चलाते हैं उनको अपने जमा पर आय नहीं मिलेगी और वे बाजार से कोई सामान नहीं खरीद पाएंगे। ऐसे में बाजार में माल की मांग कम होगी और बड़े उद्योग भी इसकी चपेट में आ जाएंगे।
आने वाले समय में तमाम उद्योगों के दिवालिया होने की आशंका बनती है। यदि कोरोना का संकट लंबा चला तो दिवालिया होने वाली कंपनियों की संख्या निरंतर बढ़ते जाने का अंदेशा है। इस परिस्थिति में तमाम देशों की सरकारों ने वित्तीय घाटा बढ़ा कर अर्थव्यवस्था को संभालने का प्रयास किया है। सरकारें ऋण लेकर अपना खर्च बढ़ा रही हैं। जैसे, रिजर्व बैंक ने मुद्रा छापी और कमर्शल बैंकों को उपलब्ध कराई। कमर्शल बैंकों से भारत सरकार ने ऋण लेकर अपने खर्च बढ़ा दिए। यह रणनीति निवेश के संदर्भ में प्रभावी हो सकती है। मान लीजिए सरकार ने ऋण लेकर हाईवे बनाए, हाईवे पर माल की ढुलाई अधिक होने से सरकार को अतिरिक्त आय हुई, उस आय से सरकार ने लिए गए ऋण की अदायगी कर दी। लेकिन कोरोना के समय जो ऋण लिया जाएगा उससे अतिरिक्त आय नहीं होगी। केवल घाटे की भरपाई होगी।
इस निवेश से सरकार लिए गए ऋण की अदायगी नहीं कर सकेगी। जैसे, सरकार ने कोरोना के समय 100 रुपये का अतिरिक्त ऋण लिया, जिस पर सरकार को 10 रुपये का अतिरिक्त ब्याज अदा करना है। 21 दिनों तक जीएसटी की वसूली नहीं हुई है। मान लें कि सरकार के इस नए निवेश से कुछ आय हो गई तो भी सरकार की कुल आय में वृद्धि नहीं होगी क्योंकि कोरोना के संकट में सरकार की सामान्य आय कम हुई है। इस तरह सरकार पर ब्याज के भार में वृद्धि होगी। उसपर ऋण और ब्याज का भार बढ़ता जाएगा। जैसे, परिवार के सदस्य का अस्पताल में उपचार करने के लिए ऋण लिया जाए तो परिवार की आय नहीं बढ़ती है। अंततः सरकार अपने खर्च में कटौती करने पर मजबूर होगी।
इसी प्रकार यदि रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर घटा दी जाए तो भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक ने ब्याज दर शून्य पर ला दी है, फिर भी अर्थव्यवस्था बढ़ नहीं रही है। मांग के अभाव में उद्यमी अथवा उपभोक्ता ऋण लेकर निवेश या खपत करने को तैयार नहीं हैं, इसलिए वित्तीय और मौद्रिक, दोनों नीतियां निष्प्रभावी होंगी। हमें लंबे समय के लिए तैयारी करनी चाहिए। मान कर चलना चाहिए कि कोरोना का प्रभाव L के आकार में होगा।
उपाय यही है कि हम क्षेत्रवार विकास की संभावनाएं बनाएं। जैसे, महाराष्ट्र और केरल में कोरोना का संकट अधिक है, तो उस संकट को महाराष्ट्र और केरल तक सीमित कर दें और ओडिशा के चारों तरफ एक अदृश्य दीवार बनाकर ओडिशा में कोरोना वायरस के प्रवेश पर रोक लगाएं। ओडिशा में राज्य के स्तर पर ही उद्योग लगाकर आर्थिक विकास करें। ओडिशा की जनता को जो माल चाहिए उसका उत्पादन राज्य में ही कर लें। एक प्रकार से यदि हम देश को राज्यों के बीच अलग- अलग अर्थव्यवस्था जैसी शक्ल दे दें और उनके आपसी लेन-देन को कम कर दें, तब एक राज्य से कोरोना का संकट दूसरे राज्य में नहीं फैलेगा। • स्वायत्तता ही समाधान
यही बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू होती है। यदि इटली, स्पेन और अमेरिका में कोरोना संकट बढ़ गया है तो दूसरे देशों को अपने चारों तरफ अदृश्य दीवार बनाकर इन देशों से लेन-देन को सीमित कर देना चाहिए और अपने क्षेत्र के संसाधनों के आधार पर अपने क्षेत्र में ही स्टील फैक्ट्री, कार फैक्ट्री, फ्रिज फैक्ट्री इत्यादि लगाकर अपनी जरूरतों को पूरा कर लेना चाहिए। हर क्षेत्र की स्वायत्त अर्थव्यवस्था में उत्पादन लागत ज्यादा आएगी, लेकिन इसे स्वीकार करना होगा। फिलहाल हमें जल्दी कोई समाधान हो जाने की उम्मीद छोड़कर लंबे समय के लिए तैयारी करनी चाहिए।
मांग के अभाव में उद्यमी अथवा उपभोक्ता ऋण लेकर निवेश या खपत करने को तैयार नहीं हैं, इसलिए वित्तीय और मौद्रिक, दोनों नीतियां निष्प्रभावी होंगी
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