18/10/2024
31 अक्टूबर को दीपावली पूजन का पहला मुहूर्त
👉प्रदोष काल में शाम 5:28 बजे से 6:25 बजे तक.
👉स्थिर लग्न में वृष लग्न का मुहूर्त शाम 6:28 बजे से 8:30 बजे तक.
👉सिंह लग्न का मुहूर्त रात 12:36 बजे से 3:21 बजे तक.
वैदिक शास्त्रों अनुसार दीपावली पूजन में अमावस्या की रात्रि, प्रदोषकाल, स्थिर लग्न होने पर पूजन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. और प्रसिद्ध विश्वसनीय पंचांगों अनुसार यह तीनों संयोग 31 अक्टूबर 2024 को देखे गए हैं. दीपावली में रात्रि व्यापिनी अमावस्या का महत्व होता है. 31 अक्टूबर की रात ही अमावस्या है. अमावस्या की रात मां लक्ष्मी धरती पर विचरण करती हैं और भक्तों के घर जाती हैं.
धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दीपावली को अपने घर और व्यवसाय स्थल पर हर्षो उल्लास से मिट्टी के दीपक जलाने करने की परम्परा होती है. मेरे व्यक्तिगत विचार अनुसार इन पर्वों में उदया तिथि नहीं ली जानी चाहिए...
Sadhak Karan Chandrani
Astrologer Dr.Karan Chandrani Bikaner
30/07/2024
हमारी जन्म कुंडली बहुत कुछ बताती है, हमारे किससे कैसे संबंध रहेंगे...
हम पूर्व जन्म में कौन थे, अगले जन्म में क्या बनेंगे ?
हमारी शिक्षा कैसी रहेगी ?
हमारी नौकरी व्यापार कैसा रहेगा ?
हमारी तरक्की उन्नति कैसी रहेगी ?
हमारे संतान से कैसे संबंध रहेंगे आदि ?
पिता के लग्न से दशम राशि में यदि पुत्र का जन्म लग्न में हो तो पुत्र-पिता तुल्य गुणवान होता है. यदि पिता के द्वितीय, तृतीय, नवम व एकादश भावस्थ राशि में पुत्र का जन्म लग्न हो तो पुत्र पिता के अधीन रहता है. यदि पिता के षष्ठम व अष्टम भाव में जो राशि हो, वही पुत्र का जन्म लग्न हो तो पुत्र, पिता का शत्रु होता है और यदि पिता के द्वादश भाव गत राशि में पुत्र का जन्म हो तो, भी पिता-पुत्र में उत्तम स्नेह नहीं रहता.
यदि पिता की कुंडली का षष्ठेश अथवा अष्टमेश पुत्र की कुंडली के लग्न में बैठा हो तो पिता से पुत्र विशेष गुणी होता है. यदि लग्नेश की दृष्टि पंचमेश पर पड़ती हो और पंचमेश की दृष्टि लग्नेश पर पड़ती हो अथवा लग्नेश पंचमेश के गृह में हो और पंचमेश नवमेश के गृह में हो अथवा पंचमेश नवमेश के नवांश में हो तो, पुत्र आज्ञाकारी और सेवक होता है.
यदि पंचम स्थान में लग्नाधिपति और त्रिकोणाधिपति साथ होकर बैठे हों और उन पर शुभग्रह की दृष्टि भी पड़ती हो तो जातक के लिए केवल राज योग ही नहीं होता वरन् उसके पुत्रादि सुशील, सुखी, उन्नतिशील और पिता को सुखी रखने वाले होते हैं.
परंतु यदि षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश पाप ग्रह और दुर्बल होकर पंचम स्थान में बैठे हों तो, ऐसा जातक अपनी संतान के रोग ग्रस्त रहने के कारण उससे शत्रुता के कारण, संतान से असभ्य व्यवहार के कारण अथवा संतान-मृत्यु के कारण पीड़ित रहता है.
यदि पंचमेश पंचमगत हो अथवा लग्न पर दृष्टि रखता हो अथवा लग्नेश पंचमस्थ हो तो पुत्र आज्ञाकारी और प्रिय होता है. स्मरण रहे कि, जितना ही पंचम स्थान का लग्न से शुभ संबंध होगा, उतना ही पिता-पुत्र का संबंध उत्तम और घनिष्ठ होगा.
यदि पंचमेश 6, 8 व 12 स्थान में हो और उस पर लग्नेश की दृष्टि न पड़ती हो तो पिता पुत्र का संबंध उत्तम होता है.
यदि पंचमेश 6, 8 व 12 स्थानगत हो तो, उस पर लग्नेश, मंगल और राहू की दृष्टि भी पड़ती हो तो पुत्र-पिता से घृणा करेगा और पिता को गाली गलौच तक करने में बाज नहीं आएगा.
पद लग्न से पुत्र और पिता का भी विचार किया जाता है. पद लग्न से केंद्र अथवा त्रिकोण में अथवा उपचय स्थान में यदि पंचम राशि पड़ती हो तो पिता-पुत्र में परस्पर मित्रता होती है.
परंतु लग्न से पंचमेश 6, 8, 12 स्थान में पड़े तो पिता-पुत्र में शत्रुतापूर्ण व्यवहार होता रहता है.
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Sadhak Karan Chandrani
Astrologer Dr.Karan Chandrani Bikaner
12/04/2024
2019 ke Lok Sabha Election ke purv Shri Govind dev Mandir me yah Mulakat Photo Shayad Deeya Kumari ji ke sath hai... jo vartman me Up Mukhy Mantri hai. Shubhkamnaye..
15/03/2024
श्री शिव महापुराण
श्रीरुद्र संहिता (पंचम खंड)
(चवालीसवां अध्याय)
अंधक की अंधता... (भाग 1)
सनत्कुमार जी बोले- हे व्यास जी ! एक बार हिरण्याक्ष के पुत्र अंधक से उसके भाइयों ने मजाक उड़ाते हुए कहा - अंधक ! तुम तो अंधे और कुरूप हो! भला तुम राज्य का क्या करोगे? दैत्यराज हिरण्याक्ष तो मूर्ख थे, जो भगवान शिव की इतनी कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न करके भी तुम जैसा कुरूप, नेत्रहीन और बेडौल पुत्र वरदान में प्राप्त किया। कभी दूसरे से प्राप्त पुत्र का भी पिता की संपत्ति पर अधिकार होता है? इसलिए इस राज्य के स्वामी हम ही हैं, तुम तो हमारे सेवक हो।
अपने भाइयों के इस प्रकार के कटु वचनों को सुनकर अंधक निराश और उदास हो गया। रात के समय जब सब सो रहे थे तो वह अपने राजमहल को छोड़कर निर्जन सुनसान और भयानक डरावने वन में चला गया। वहां उस सुनसान वन में जाकर उसने तपस्या आरंभ कर दी। वह दस हजार वर्षों तक घोर तपस्या करता रहा परंतु जब कोई परिणाम नहीं निकला तो उसने अपने शरीर को अग्नि में जलाकर होम करना चाहा। ठीक उसी समय स्वयं ब्रह्माजी वहां प्रकट हो गए।
ब्रह्माजी बोले-पुत्र अंधक! मांगो क्या मांगना चाहते हो? मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूं। तुम अपना इच्छित वर मांग सकते हो। मैं तुम्हारी मनोकामना अवश्य ही पूरी करूंगा। यह सुनकर अंधक बहुत प्रसन्न हुआ। उसने हाथ जोड़कर ब्रह्माजी की स्तुति की और बोला- हे कृपानिधान ब्रह्माजी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न होकर मुझे कोई वर देना चाहते हैं तो आप कुछ ऐसा करें कि मेरे निष्ठुर भाइयों ने जो मुझसे मेरा राज्य छीन लिया है,
वे सब मेरे अधीन हो जाएं। मेरे नेत्र ठीक हो जाएं अर्थात मुझे दिव्य दृष्टि की प्राप्ति हो तथा मुझे कोई भी न मार सके - वह देवता, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, नारायण अथवा स्वयं भगवान शिव ही क्यों न हों। अंधक के इन वचनों को सुनकर ब्रह्माजी बोले- हे अंधक !
तुम्हारे द्वारा कही हुई दोनों बातों को मैं स्वीकार करता हूं परंतु इस संसार में कोई भी अजर-अमर नहीं है। सभी को एक न एक दिन काल का ग्रास बनना पड़ता है। मैं सिर्फ तुम्हारी इतनी मदद कर सकता हूं कि जिस प्रकार की और जिसके हाथ से तुम चाहो अपनी मृत्यु प्राप्त कर सकते हो।
तब ब्रह्माजी के वचन सुनकर अंधक कुछ देर के लिए सोच में डूब गया। फिर बोला- हे प्रभु! तीनों कालों की उत्तम, मध्यम और नीच नारियों में से जो भी नारी सबकी जननी हो, सबमें रत्न हो, जो सब मनुष्यों के लिए दुर्लभ तथा शरीर व मन के लिए अगम्य है, उसको अपने सामने पाकर जब मेरे अंदर काम भावना उत्पन्न हो, उसी समय मेरा नाश हो। इस प्रकार का वरदान सुनकर ब्रह्माजी ने 'तथास्तु' कहा और उससे बोले, दैत्येंद्र ! तेरे सभी वचन अवश्य ही पूरे होंगे. अब तू जाकर अपना राज्य संभाल.
15/03/2024
भक्ति बीज पलटे नहीं, जो जुग जाय अनन्त।
ऊंच नीच बर अवतरै, होय सन्त का सन्त।।
👉भक्ति का बोया बीज कभी व्यर्थ नहीं जाता चाहे अनन्त युग व्यतीत हो जाये. यह किसी भी कुल जाति में ही, परन्तु इसमें होने वाला भक्त सन्त ही रहता है. छोटा बड़ा या ऊच नीच नही होता अर्थात भक्त की कोई जाति नहीं होती.
हमेशा की तरह सिमरन करते हुए अपने कार्य में तत्लीन रहने वाले भक्त रविदास जी आज भी अपने जूती गांठने के कार्य में तल्लीन थे.
अरे, मेरी जूती थोड़ी टूट गई है, इसे गाँठ दो, राह गुजरते एक पथिक ने भगत रविदास जी से थोड़ा दूर खड़े हो कर कहा आप कहाँ जा रहे हैं श्रीमान? भगत जी ने पथिक से पूछा.
मैं माँ गंगा स्नान करने जा रहा हूँ ,तुम चमड़े का काम करने वाले क्या जानो गंगा जी के दर्शन और स्नान का महातम.
सत्य कहा श्रीमान, हम मलिन और नीच लोगो के स्पर्श से पावन गंगा भी अपवित्र हो जाएगी. आप भाग्यशाली हैं जो तीर्थ स्नान को जा रहे हैं.
भगत जी ने कहा सही कहा तीर्थ स्नान और दान का बहुत महातम है. ये लो अपनी मेहनत की कीमत एक कोड़ी और मेरी जूती मेरी तरफ फेंको.
आप मेरी तरफ कौड़ी को न फेंकिए, ये कौड़ी आप गंगा माँ को गरीब रविदास की भेंट कह कर अर्पित कर देना.
पथिक अपने राह चला गया, रविदास पुनः अपने कार्य में लग गए
अपने स्नान ध्यान के बाद जब पथिक गंगा दर्शन कर घर वापिस चलने लगा तो उसे ध्यान आया, अरे उस शुद्र की कौड़ी तो गंगा जी के अर्पण की नही, नाहक उसका भार मेरे सिर पर रह जाता, ऐसा कह कर उसने कौड़ी निकाली और गंगा जी के तट पर खड़ा हो कर कहा, हे माँ गंगा, रविदास की ये भेंट स्वीकार करो.
तभी गंगा जी से एक हाथ प्रगट हुआ और आवाज आई
लाओ भगत रविदास जी की भेंट मेरे हाथ पर रख दो
हक्के बक्के से खड़े पथिक ने वो कौड़ी उस हाथ पर रख दी
हैरान पथिक अभी वापिस चलने को था कि पुनः उसे वही स्वर सुनाई दिया..
पथिक, ये भेंट मेरी तरफ से भगत रविदास जी को देना..
गंगा जी के हाथ में एक रत्न जड़ित कंगन था,
हैरान पथिक वो कंगन ले कर अपने गंतव्य को चलना शुरू किया,
उसके मन में ख्याल आया
रविदास को क्या मालूम, कि माँ गंगा ने उसके लिए कोई भेंट दी है, अगर मैं ये बेशकीमती कंगन यहाँ रानी को भेंट दूँ तो राजा मुझे धन दौलत से मालामाल कर देगा.
ऐसा सोच उसने राजदरबार में जा कर वो कंगन रानी को भेंट कर दिया. रानी वो कंगन देख कर बहुत खुश हुई, अभी वो अपने को मिलने वाले इनाम की बात सोच ही रहा था कि रानी ने अपने दूसरे हाथ के लिए भी एक समान दूसरे कंगन की फरमाइश राजा से कर दी.
पथिक, हमे इसी तरह का दूसरा कंगन चाहिए राजा बोला
आप अपने राज जौहरी से ऐसा ही दूसरा कंगन बनवा लें पथिक बोला.
पर इस में जड़े रत्न बहुत दुर्लभ हैं. ये हमारे राजकोष में नहीं हैं. अगर पथिक इस एक कंगन का निर्माता है तो दूसरा भी बना सकता है. राजजोहरी ने राजा से कहा
पथिक अगर तुम ने हमें दूसरा कंगन ला कर नहीं दिया तो हम तुम्हे मृत्युदण्ड देंगे, राजा गुर्राया
पथिक की आँखों से आंसू बहने लगे
भगत रविदास से किया गया छल उसके प्राण लेने वाला था.
पथिक ने सारा सत्य राजा को कह सुनाया और राजा से कहा केवल एक भगत रविदास जी ही हैं जो गंगा माँ से दूसरा कंगन ले कर राजा को दे सकते हैं.
राजा पथिक के साथ भगत रविदास जी के पास आया
भगत जी सदा की तरह सिमरन करते हुए अपने दैनिक कार्य में तल्लीन थे.
पथिक ने दौड़ कर उनके चरण पकड़ लिए और उनसे अपने जीवन रक्षण की प्रार्थना की.
भगत रविदास जी ने राजा को निकट बुलाया और पथिक को जीवनदान देने की विनती की.
राजा ने जब पथिक के जीवन के बदले में दूसरा कंगन माँगा तो भगत रविदास जी ने अपनी नीचे बिछाई चटाई को हटा कर राजा से कहा... आओ और अपना दूसरा कंगन पहचान लो
राजा जब निकट गया तो क्या देखता है
भगत जी के निकट जमीन पारदर्शी हो गई है और उस में बेशकीमती रत्न जड़ित असंख्य ही कंगन की धारा अविरल बह रही है.
पथिक और राजा भगत रविदास जी के चरणों में गिर गए और उनसे क्षमा याचना की.
प्रभु के रंग में रंगे देवमाला अम्बाशरणं महात्मा लोग, जो अपने दैनिक कार्य करते हुए भी प्रभु का नाम सिमरन करते हैं उन से पवित्र और बड़ा कोई तीर्थ नही.
उन्हें तीर्थ वेद शास्त्र क्या व्यख्यान करेंगे उनका जीवन ही वेद है उनके दर्शन ही तीर्थ है.